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गरà¥à¤ गीता: Garbh Geeta | किन कारणों से आता है जीव गरà¥à¤ में ?
धरà¥à¤® आसà¥à¤¥à¤¾ / By Sugam Verma
गरà¥à¤ गीता: Garbh Geeta | किन कारणों से आता है जीव गरà¥à¤ में ?
Table of Contents
Garbh Geeta: किन कारणों से आता है जीव गरà¥à¤ में ?
Garbh Geeta सà¥à¤¤à¥à¤¤ संवाद गरà¥à¤ गीता से लिया गया है जिसमें à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€à¤•ृषà¥à¤£ तथा उनके पà¥à¤°à¤¿à¤¯ à¤à¤•à¥à¤¤ à¤à¤µà¤‚ सखा अरà¥à¤œà¥à¤¨ के मधà¥à¤¯ संवाद किया गया है। इसमें à¤à¤—वान मधà¥à¤¸à¥‚दन अरà¥à¤œà¥à¤¨ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ पूछे गये पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨à¥‹à¤‚ का उतà¥à¤¤à¤° दे रहे हैं।
à¤à¤• समय की बात है अरà¥à¤œà¥à¤¨ ने à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€à¤•ृषà¥à¤£ से पूछा कि à¤à¤—वन कà¥à¤¯à¤¾ कारण है कि किसी जीव को मां के गरà¥à¤ में आना पड़ता है तथा à¤à¤¾à¤‚ति-à¤à¤¾à¤‚ति के कषà¥à¤Ÿ à¤à¥‹à¤—ने पड़ते हैं? à¤à¤¸à¤¾ जीव के किन गà¥à¤£ तथा दोषों के कारण होता है? पà¥à¤°à¤¾à¤£à¥€ अपने जनà¥à¤® से पूरà¥à¤µ तो कषà¥à¤Ÿ पाता ही है जनà¥à¤® लेते समय à¤à¥€ उसे कषà¥à¤Ÿà¥‹à¤‚ से छà¥à¤Ÿà¤•ारा नहीं मिलता।
उसके बाद आजीवन मृतà¥à¤¯à¥ काल तक उसे रोग कषà¥à¤Ÿ आदि का सामना करना पड़ता है (Garbh Geeta in hindi)। यह सà¥à¤¨à¤•र à¤à¤—वान मधà¥à¤¸à¥‚दन मà¥à¤¸à¥à¤•राते हà¥à¤¯à¥‡ बोले कि -‘‘ हे शà¥à¤°à¥‡à¤·à¥à¤ धनà¥à¤°à¥à¤§à¤¾à¤°à¥€ अरà¥à¤œà¥à¤¨! मृतà¥à¤¯à¥ लोक में जनà¥à¤® लेने के पशà¥à¤šà¤¾à¤¤ पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• जीवातà¥à¤®à¤¾ इस संसार की माया से पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤¿à¤¤ होकर à¤à¥Œà¤¤à¤¿à¤• संसाधनों के बंधनों में बंध जाती है।
वह अपना मà¥à¤–à¥à¤¯ उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ जो कि मातà¥à¤° ईशà¥à¤µà¤° की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ है उसे à¤à¥‚लकर परिवार, पà¥à¤¤à¥à¤°-पà¥à¤¤à¥à¤°à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ सगे-समà¥à¤¬à¤¨à¥à¤§à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚, आदि के मोह में फंसकर ही रह जाती है। मृतà¥à¤¯à¥à¤ªà¤°à¥à¤¯à¤¨à¥à¤¤ तक इन सà¤à¥€ में फंसे होने के बाद जब जीव का अनà¥à¤¤à¤¿à¤® समय आता है तो वह अपनी अधूरी इचà¥à¤›à¤¾à¤“ं के बारे में ही सोचते हà¥à¤¯à¥‡ पà¥à¤°à¤¾à¤£ तà¥à¤¯à¤¾à¤—ता है (Garbh Geeta) ।
इसे à¤à¥€ पढेंं- समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥â€à¤à¤—वदà¥â€à¤—ीता Shrimad Bhagwat Geeta In Hindi
à¤à¤¸à¤¾ इस कारण होता है कि मानव जाति कà¤à¥€ संतà¥à¤·à¥à¤Ÿ नहीं होती उसे सदैव कà¥à¤› और की चाहत बनी ही रहती है यही कारण है कि मनà¥à¤·à¥à¤¯ बार-बार जनà¥à¤® लेता तथा मरता रहता है तथा यह चकà¥à¤° निरंतर चलता ही रहता है।
अरà¥à¤œà¥à¤¨ पूछते हैं कि –‘‘ हे पà¥à¤°à¤à¥! इस माया से पार पाना तो बड़ा कठिन कारà¥à¤¯ है। बड़े-बड़े ऋषि-मà¥à¤¨à¤¿ à¤à¥€ इससे पार नहीं पा सके तो साधारण मनà¥à¤·à¥à¤¯ की तो बात ही कà¥à¤¯à¤¾ है। काम, कà¥à¤°à¥‹à¤§, लोà¤, मोह और अहंकार ये पांच à¤à¤¸à¥‡ शतà¥à¤°à¥ हैं जिनसे मानव दिन-रात जूà¤à¤¤à¤¾ रहता है कृपया यह बताइये कि साधारण मनà¥à¤·à¥à¤¯ इनसे छà¥à¤Ÿà¤•ारा पाकर अपना मन किस पà¥à¤°à¤•ार पà¥à¤°à¤à¥ à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ की ओर मोड़े।
कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि यह मन तो मदमसà¥à¤¤ हाथी की à¤à¤¾à¤‚ति है जो कà¤à¥€ टिककर नहीं रहता इसकी गति वायॠके वेग से à¤à¥€ अधिक तीवà¥à¤° है। इस मन रूपी मसà¥à¤¤ हाथी को किस पà¥à¤°à¤•ार नियंतà¥à¤°à¤¿à¤¤ किया जा सकता है?‘‘
Garbh Geeta
(Garbh Geeta in Hindi)
शà¥à¤°à¥€à¤•ृषà¥à¤£ कहते हैं कि: मन रूपी हाथी को नियंतà¥à¤°à¤¿à¤¤ करने के लिठजà¥à¤žà¤¾à¤¨ रूपी अंकà¥à¤¶ की आवशà¥à¤¯à¤•ता होती है, à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ और जà¥à¤žà¤¾à¤¨ को अà¤à¥à¤¯à¤¾à¤¸ के दà¥à¤µà¤¾à¤°à¤¾ ही पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ किया जा सकता है। अहंकार करने से मानव का जीवन नरà¥à¤• के समान हो जाता है उसका मन सदैव वà¥à¤¯à¤¾à¤•à¥à¤² ही रहता है तथा कà¤à¥€ शांत नहीं रहता।
अरà¥à¤œà¥à¤¨ पूछते हैं –‘‘ कà¥à¤¯à¤¾ कारण है कि किसी की पतà¥à¤¨à¤¿ की मृतà¥à¤¯à¥ अलà¥à¤ª आयॠमें ही हो जाती है तथा पिता के रहते पà¥à¤¤à¥à¤° की मृतà¥à¤¯à¥ हो जाती है।‘‘ शà¥à¤°à¥€ कृषà¥à¤£ कहते हैं कि जो वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ करà¥à¤œ लेकर उसे नहीं चà¥à¤•ाता उसके दणà¥à¤¡ सà¥à¤µà¤°à¥‚प उसकी पतà¥à¤¨à¤¿ की मृतà¥à¤¯à¥ हो जाती है तथा जो किसी वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ की अमानत लेकर उसे नहीं लौटाता उसके बचà¥à¤šà¥‡ मर जाते हैं। ये बड़े à¤à¤¯à¤‚कर पाप हैं।
मनà¥à¤·à¥à¤¯ किस कारण से आजीवन रोगी रहता है? तथा किस कारण पशॠयोनी को पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ होता है ?
शà¥à¤°à¥€ कृषà¥à¤£ उतà¥à¤¤à¤° देते हà¥à¤ कहते हैं: ‘‘पारà¥à¤¥ जो मनà¥à¤·à¥à¤¯ कनà¥à¤¯à¤¾à¤“ं तथा महिलाओं आदि को बेचने का वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤¾à¤° करता है वह à¤à¤¯à¤‚कर रोगों से पीड़ित रहता है तथा जो अà¤à¤•à¥à¤·à¥à¤¯ पदारà¥à¤¥à¤¾à¥‡à¤‚ का सेवन करता है तथा मदिरा पान कर दूसरों को पà¥à¤°à¤¤à¤¾à¥œà¤¿à¤¤ करता है वह गधे का जनà¥à¤® पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤ करता है। इसी पà¥à¤°à¤•ार à¤à¥‚ठी गवाही देने वाले अगले जनà¥à¤® में सà¥à¤¤à¥à¤°à¥€ बनते हैं।
जो à¤à¥‹à¤œà¤¨ का à¤à¥‹à¤— à¤à¤—वान को न लगाकर पहले सà¥à¤µà¤¯à¤‚ गà¥à¤°à¤¹à¤£ कर लेते हैं वे शूकर आदि की योनी में जनà¥à¤® लेते हैं।
अरà¥à¤œà¥à¤¨ पूछते हैं – किन कारणों से इस जनà¥à¤® में धनी तथा वाहन आदि के सà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ बनते हैं?
शà¥à¤°à¥€ कृषà¥à¤£ उतà¥à¤¤à¤° देते हà¥à¤- जो मनà¥à¤·à¥à¤¯ उचित रीति-नीति से सà¥à¤µà¤°à¥à¤£ दान करते तथा कनà¥à¤¯à¤¾ दान करते हैं वे इस जनà¥à¤® में धनी हैं। वे वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने कà¤à¥€ अनà¥à¤¨à¤¦à¤¾à¤¨ किया है वे रूपवान होते हैं तथा विदà¥à¤¯à¤¾ का दान करने वाले वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ विदà¥à¤µà¤¾à¤¨ होते हैं। इसी पà¥à¤°à¤•ार संतों की सेवा करने वाले धनवान तथा पà¥à¤¤à¥à¤°à¤µà¤¾à¤¨ होते हैं (गरà¥à¤ गीता)।
अरà¥à¤œà¥à¤¨ पूछते हैं – मनà¥à¤·à¥à¤¯ धन तथा सांसारिक मोह-माया में कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ फंसा रहता है?
शà¥à¤°à¥€ कृषà¥à¤£ कहते हैं कि- जब पà¥à¤°à¤¾à¤£à¥€ मेरी कृपा से वंचित हो जाता है तब वह सांसारिक बंधनों के मोह में आसकà¥à¤¤ हो जाता है। संसार के समसà¥à¤¤ बंधन नाशवान हैं यही जानकर विवेकीजन इन बंधनों में फंसते नहीं हैं तथा दूर रहा करते हैं।
वे जानते हैं कि लाà¤-हानि, जीवन-मरण, यश-अपयश तथा मान-समà¥à¤®à¤¾à¤¨ सà¤à¥€ कà¥à¤› ईशà¥à¤µà¤° के आधीन हैं संसार में घटने वाली पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• घटना परमातà¥à¤®à¤¾ की ईचà¥à¤›à¤¾ से ही घटती है।
यही कारण है कि विवेकीजन दà¥à¤ƒà¤–-सà¥à¤– चाहे कैसी à¤à¥€ परिसà¥à¤¥à¤¿à¤¤à¤¿ हो, समान à¤à¤¾à¤µ से रहते हैं। जो मनà¥à¤·à¥à¤¯ इन सांसारिक बंधनों से दूर रहकर धारà¥à¤®à¤¿à¤• सà¥à¤¥à¤²à¥‹à¤‚ में जाकर पà¥à¤°à¥‡à¤® तथा à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿-à¤à¤¾à¤µ से मेरा दरà¥à¤¶à¤¨ करता है उसका नाश नहीं होता।
इसे à¤à¥€ पढेंं- समà¥à¤ªà¥‚रà¥à¤£ शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥â€à¤à¤—वदà¥â€à¤—ीता Shrimad Bhagwat Geeta In Hindi
गà¥à¤°à¥‚ की महिमा तथा गà¥à¤°à¥‚ दकà¥à¤·à¤¿à¤£à¤¾ का महतà¥à¤µ: Guru Dakshina
(Garbh Geeta) शà¥à¤°à¥€ कृषà¥à¤£ अरà¥à¤œà¥à¤¨ को आगे समà¤à¤¾à¤¤à¥‡ हà¥à¤ कहते हैं कि à¤à¤¸à¤¾ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤¾à¤°à¥€ तथा संयमी पà¥à¤°à¥à¤· जो सदैव ईशà¥à¤µà¤° की à¤à¤•à¥à¤¤à¤¿ तथा परोपकार में लगा हो उसे ही अपना गà¥à¤°à¥ बनाना चाहिये। गà¥à¤°à¥ के माधà¥à¤¯à¤® से ही ईशà¥à¤µà¤° की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ हो सकती है अनà¥à¤¯à¤¥à¤¾ नहीं।
गà¥à¤°à¥ का निरादर करने वाला मनà¥à¤·à¥à¤¯ कà¤à¥€ ईशà¥à¤µà¤° की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ नहीं कर सकता तथा आजीवन मृतà¥à¤¯à¥à¤²à¥‹à¤• में à¤à¤Ÿà¤•ता रहता है à¤à¤¸à¥‡ वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ का तो मà¥à¤– à¤à¥€ नहीं देखना चाहिà¤à¥¤
समसà¥à¤¤ संसार के गà¥à¤°à¥ जगनà¥à¤¨à¤¾à¤¥ हैं, विदà¥à¤¯à¤¾ का गà¥à¤°à¥ काशी है तथा बà¥à¤°à¤¾à¤¹à¥à¤®à¤£ का गà¥à¤°à¥ संनà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥€ है। संनà¥à¤¯à¤¾à¤¸à¥€ उसे कहते हैं जो कि सब कà¥à¤› तà¥à¤¯à¤¾à¤—कर मà¥à¤à¤®à¥‡à¤‚ रम गया हो तथा अपना सरà¥à¤µà¤¸à¥à¤µ ही मà¥à¤à¥‡ समरà¥à¤ªà¤¿à¤¤ कर दे। गà¥à¤°à¥ से विमà¥à¤– वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿ का तो à¤à¤œà¤¨ à¤à¥€ अपवितà¥à¤° होता है उसके सà¤à¥€ करà¥à¤® निषà¥à¤«à¤² होते हैं।
गà¥à¤°à¥‚ की सेवा करने वाले को सैकड़ों अशà¥à¤µà¤®à¥‡à¤§ यजà¥à¤žà¥‹à¤‚ के फल की पà¥à¤°à¤¾à¤ªà¥à¤¤à¤¿ होती है।
अरà¥à¤œà¥à¤¨ जो à¤à¥€ गरà¥à¤ गीता (Garbh Geeta) में अंकित हम दोनों के इस संवाद को सà¥à¤¨à¤¤à¤¾ या सà¥à¤¨à¤¾à¤¤à¤¾ तथा पà¥à¤¤à¤¾ है वे गरà¥à¤ के दà¥à¤ƒà¤– से छà¥à¤Ÿà¤•ारा पा लेता है तथा नरà¥à¤• की चौरासी योनियों के चकà¥à¤° से मà¥à¤•à¥à¤¤ होकर जनà¥à¤® तथा मरण से मà¥à¤•à¥à¤¤ हो जाता है।
अतः पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• मनà¥à¤·à¥à¤¯ को इसे पà¥à¤¨à¤¾ तथा सà¥à¤¨à¤¨à¤¾ चाहिठà¤à¤¸à¤¾ करने से (Garbh Geeta) à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€à¤•ृषà¥à¤£ की अनà¥à¤•मà¥à¤ªà¤¾ à¤à¤•à¥à¤¤ पर सदैव बनी रहती है तथा सà¤à¥€ मनोकमाना पूरà¥à¤£ होने के साथ-साथ इस जनà¥à¤® तथा पिछले जनà¥à¤®à¥‹à¤‚ में किये गये पापों से à¤à¥€ छà¥à¤Ÿà¤•ारा मिलता है।
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